हिन्दी कविता “Haar maan jata hoon” by Gaurav Kumar Bhardwaj

Haar maan jata hoon hindi poetry

खुद की खोज में एक यात्रा: गौरव कुमार भारद्वाज की हिन्दी कविता

परिचय (Introduction):

गौरव कुमार भारद्वाज द्वारा रचित कविता “हार मान जाता हूँ – खुद की खोज में एक यात्रा” एक अद्वितीय और प्रभावशाली हिन्दी कविता है जो उनकी आंतरिक यात्रा को व्यक्त करती है। यह कविता हमें दिखाती है कि जीवन में हमारी अभिव्यक्ति, भावनाएं और अपनी पहचान की खोज न केवल महत्वपूर्ण होती है, बल्कि हमें निरंतरता और सामर्थ्य के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इस कविता में प्रस्तुत किए गए भावों, सुंदरता और पाठकों के लिए सरलता को मजबूती से संकलित किया गया है।

लेखक परिचय
गौरव कुमार भारद्वाज एक युवा लेखक हैं जिन्होंने पटना विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर की 
पढ़ाई की है। उन्होंने अपनी कला की प्रवृत्ति को अपने कविताओं के माध्यम से अद्वितीय रूप से 
व्यक्त किया है। उनकी कविताओं में सुंदर रचनात्मकता और मनोहारी अंग्रेज़ी शैली का प्रयोग होता है।

हिन्दी कविता: हार मान जाता हूँ

खुद को बहुत मानता हूँ,
फिर भी हार मान जाता हूँ,
की तेरे आगे एक भी नहीं चलती मेरी,
क्यों तुझे सोच कर लड़खड़ा जाता हूँ।

कभी तेरे आने से चहक उठता था पार्क का कोना-कोना,
आजकल तो बस वहाँ बैठ कर आता है मुझको रोना।

मन को तेरा इंतजार हर पल रहता है,
क्यों दिमाग को इस पर ऐतबार नहीं होता है।

ज़िंदगी में पहली बार हारा-हारा सा लगता हूँ,
अकेला तेरी गलियों में मारा-मारा फिरता हूँ।

ढूंढता हूँ तुम्हे तुम्हारी गलियों में घंटों पहर,
फिर थक हार कर तेरे होस्टल के कॉर्नर पर बैठ जाता हूँ।

अब तो तेरी गली का जर्रा-जर्रा जानता है मुझे,
पागल कहकर पहचानता है मुझे।

कब से ये सब जानकर भी हो तुम बेखबर,
कभी तो मेरे मसले का भी लो खबर।

खुद को बहुत तसल्ली दिलाता हूँ,
फिर भी क्या करूं,
हार मान जाता हूँ।

क्यों तुझे औरों की तरह मुझपर ऐतबार नहीं है,
क्या मेरे लिए बस इंतज़ार ही इंतज़ार है।

तुम्हें हमेशा दूसरों का खयाल है,
तुमने कभी नहीं सोचा के मेरे लिए तो ज़िंदगी का सवाल है।

कितना खुद को सब्र करता हूँ,
फिर भी क्या करूं,
हार मान जाता हूँ।

                                   – गौरव कुमार भारद्वाज

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Hindi Poetry: Haar Maan Jata Hoon

Khud ko bahut manata hoon,
Phir bhi haar maan jata hoon,
Ki tere aage ek bhi nahi chalti meri,
Kyu tujhe soch kar ladkhada jata hoon.

Kabhi tere aane se chahak uthta tha park ka kona-kona,
Aajkal toh bas waha baith kar aata hai mujko rona.

Mann ko tera intezar har pal rehta hai,
Kyu dimag ko ispar aitbaar nahi hota hai.

Zindagi mein pahli baar haara-haara sa lagta hoon,
Akela teri galiyon mein maara-maara phirta hoon.

Dhundhta hoon tumhe tumhare galiyon mein ghanto pahar,
Phir thak haar kar tere hostel ke corner par baith jata hoon.

Ab to teri gali ka jarra – jarra janta hai mujhe,
Pagal kahkar pahchanta hai mujhe.

Kab se ye sab jankar bhi ho tum bekhabar,
Kabhi to mere masle ka bhi lo khabar.

Khud ko bahut tassalli dilata hoon,
Phir bhi kya karu,
Haar maan jata hoon.

Kyu tujhe auron ki tarah mujhpar aitbaar nahi hai,
Kya mere liye bas intezaar hi intezaar hai.

Tumhe hamesha dusro ka khayal hai,
Tumne kabhi nahi socha ke mere liye toh zindagi ka sawal hai.

Kitna khud ko sabra karata hoon,
Phir bhi kya karu,
Haar maan jata hoon.

                                              – Gaurav Kumar Bhardwaj

यह कविता गौरव कुमार भारद्वाज द्वारा रचित है और उनके आंतरिक मन की यात्रा को व्यक्त करती है। कविता में व्यक्त की गई भावनाएं हमें उनकी खोज के रास्ते में संगठित करती हैं और उनके यात्री रूप में अपनी खुद की पहचान को खोजने की प्रेरणा देती हैं। यह कविता अपार संवेदनशीलता और सरलता के साथ लिखी गई है ताकि पाठकों को आसानी से समझने में मदद मिल सके।हमें उम्मीद है कि आपको यह कविता पसंद आई होगी। अगर आपके पास हमारे लिए कोई सुझाव हो तो आप हमें हर्षपूर्वक अपने सुझाव को हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध कमेंट बॉक्स में साझा कर सकते हैं। धन्यवाद आपका!

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